ज्यां द्रेज कौन हैं, जिन्हें नहीं पहचान सके पत्रकार, गलती किसकी?

0

CJP प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर के पास हिरासत में लिए गए अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज करीब 11 घंटे बाद रिहा हुए। जानें वे क्यों अहम हैं।

Who is Jean Drèze

Who is Jean Drèze

जाने-माने अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज को शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर के पास हिरासत में ले लिया। वे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पोस्टर लेकर केरल हाउस के पास पहुंचे थे। उनके साथ फिल्मकार अबान रजा, शोधकर्ता परन अमिताभ और विद्वान व कलाकार अंजलि एस भी थीं। चारों को पुलिस थाने ले जाया गया।

द्रेज को करीब 11 घंटे बाद शाम 8 बजे के आसपास रिहा किया गया। आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने उन्हें हिरासत के चार घंटे बाद ही छोड़ने की पेशकश की थी। द्रेज ने बाकी हिरासत में लिए गए लोगों के बिना जाने से इनकार कर दिया। द्रेज 67 साल के हैं और झारखंड में रहते हैं। वे भारत में करीब 50 साल से रह रहे हैं और देश की कल्याण नीतियों पर उनके काम की वजह से उन्हें जाना जाता है।

शनिवार को जंतर-मंतर के पास क्या हुआ

CJP ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन बुलाया था। रिपोर्टों के मुताबिक यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ था। प्रदर्शन से पहले दिल्ली में कड़ी पाबंदियां लगाई गईं। कई रास्ते बंद किए गए। ट्रेनें रद्द होने और मेट्रो सेवाओं पर रोक की भी खबरें आईं।

आर्टिकल 14 के मुताबिक पुलिस ने शनिवार को दिल्ली भर में हजारों लोगों को हिरासत में लिया। CJP के नेतृत्व में शामिल अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हवाई जहाज से ही हिरासत में ले लिया गया। प्रदर्शनकारियों को बैरिकेड लगे रास्तों से जंतर-मंतर पहुंचने में मुश्किल हुई। पत्रकारों को भी हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई।

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक रविवार को दिल्ली की एक अदालत ने CJP के संस्थापक और नेताओं को रिहा कर दिया।

बिना कुछ बताए उठा लिया, द्रेज का दावा

द्रेज ने थाने से फोन पर इंडियन एक्सप्रेस से बात की। उन्होंने बताया कि वे चारों केरल हाउस के पास पोस्टर लेकर खड़े थे और मीडिया से बात कर रहे थे। तभी पुलिस ने बिना कुछ कहे उन्हें उठा लिया। उन्होंने कहा कि वे कुछ भी गलत नहीं कर रहे थे।

द्रेज के मुताबिक उनके समूह के कई और लोग प्रदर्शन स्थल तक पहुंच ही नहीं सके, क्योंकि रास्ते बंद थे। इसी वजह से उन्होंने सोचा कि वहां मौजूदगी दर्ज कराई जाए। द्रेज ने कहा कि उन्होंने ऐसी घटना पहले कभी नहीं देखी। उन्होंने प्रदर्शन से पहले किए गए बड़े पैमाने के एहतियाती इंतजामों पर भी सवाल उठाए।

द्रेज ने बताया कि वे दो दिन पहले झारखंड से दिल्ली के लिए निकले थे। वे शुक्रवार सुबह दिल्ली पहुंचे, ठीक उस समय जब ट्रेन सेवाएं रद्दीकरण से प्रभावित होने लगी थीं। उनके मुताबिक रांची को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने वाली कई ट्रेनें रद्द हुईं। इससे दिल्ली आने वाले लोगों के लिए प्रदर्शन में पहुंचना मुश्किल हो गया।

जेएनयू की शोधार्थी परन अमिताभ ने बताया कि उनका समूह कुछ ही मिनट से पोस्टर थामे और इंटरव्यू दे रहा था, जब पुलिस पहुंच गई। उनके मुताबिक पुलिस ने कुछ नहीं बताया, धक्का देकर बस में बैठा दिया और पोस्टर फाड़ दिए। उनका आरोप है कि बस में भी उन्हें मीडिया से बात नहीं करने दी गई। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस पहले उन्हें किसी दूसरे थाने ले गई, फिर आदर्श नगर थाने लाई।

थाने में सबके साथ रिहाई की शर्त

आर्टिकल 14 के मुताबिक हिरासत में लिए गए चारों लोगों को करीब 16 किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम दिल्ली के आदर्श नगर थाने ले जाया गया। वहां उनकी मुलाकात और हिरासत में लिए गए लोगों से हुई। इनमें ज्यादातर पुरुष थे और बड़ी संख्या असम और पश्चिम बंगाल के लोगों की थी। द्रेज ने बताया कि इनमें से कई लोगों ने उन्हें कहा कि वे प्रदर्शन का हिस्सा थे ही नहीं और उन्हें इसकी जानकारी भी नहीं थी।

पुलिस ने कुछ घंटे बाद द्रेज को रिहा करने की पेशकश की। द्रेज और उनके साथियों ने पुलिस से कहा कि या तो सभी हिरासत में लिए गए लोगों को एक साथ छोड़ा जाए, या वे वहीं रुकेंगे। उन्होंने इस मांग को लिखित आवेदन में भी दिया। आखिरकार करीब 11 घंटे की हिरासत के बाद रात लगभग आठ बजे सभी लोगों को छोड़ दिया गया।

रिहा हुए एक युवक शमीम जाफर ने आर्टिकल 14 से कहा कि वे द्रेज के बहुत आभारी हैं। द्रेज ने कहा कि वे इस देश में करीब 50 साल से हैं, पर किसी प्रदर्शन को दबाने के लिए इतनी ताकत इस्तेमाल होते उन्होंने पहले नहीं देखी।

दूसरे लोगों के आरोप

द्रेज ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन से बिना जुड़े कई लोगों को भी हिरासत में लिया गया। उनके मुताबिक ऐसे करीब 30 से 35 लोग थे, जो मजदूर वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों से थे। उनका आरोप है कि इन लोगों के साथ बदसलूकी और धक्का-मुक्की हुई।

इंडियन एक्सप्रेस ने कुछ हिरासत में लिए गए लोगों से भी बात की। उनके दावे इस प्रकार हैं।

बिहार के भागलपुर के 30 साल के शाहिद हुसैन ने बताया कि वे निजी काम से दिल्ली आए थे और अगले दिन लौटने वाले थे। वे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से खाना ढूंढने निकले थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोक लिया। उनका आरोप है कि पुलिस ने उनका फोन ले लिया, बस में बैठा दिया और फोन तोड़ दिया।

उत्तर प्रदेश के हापुड़ के 24 साल के गुलफाम ने बताया कि वे बंगला साहिब गुरुद्वारे में सेवा के लिए जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें दूसरा रास्ता लेने को कहा। वे प्रदर्शन स्थल के पास थोड़ी देर रुके, तो पुलिसकर्मियों ने पूछा कि कहां जा रहे हो और रास्ता दिखाने की बात कही। साथ चलने पर उन्हें बस में बैठा दिया गया।

दिल्ली के करोल बाग के 22 साल के सौरभ ने बताया कि वे आर के आश्रम के पास एक दोस्त से मिलकर नई दिल्ली स्टेशन जा रहे थे। उनके मुताबिक पुलिस ने उन्हें बस में बैठने को कहा और भरोसा दिलाया कि 15 से 20 मिनट में कुछ सवाल पूछकर छोड़ दिया जाएगा। उनका आरोप है कि उनका फोन ले लिया गया। सौरभ ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों को देखकर नहीं लगता था कि वे प्रदर्शन के लिए आए थे। कोई खाना खाने गया था, कोई सवारी ढूंढ रहा था।

ये सभी बातें हिरासत में लिए गए लोगों के आरोप हैं। जिन रिपोर्टों में ये दावे आए हैं, उनमें पुलिस की प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है।

कौन हैं ज्यां द्रेज

ज्यां द्रेज बेल्जियम में जन्मे भारतीय कल्याणकारी अर्थशास्त्री, समाज विज्ञानी और कार्यकर्ता हैं। उनका जन्म 22 जनवरी 1959 को बेल्जियम के ल्यूवेन में हुआ था। उनके पिता जैक्स द्रेज जाने-माने अर्थशास्त्री थे और उन्होंने यूनिवर्सिटी कैथोलिक डी लूवेन में सेंटर फॉर ऑपरेशंस रिसर्च एंड इकोनॉमेट्रिक्स की स्थापना की थी। उनके भाई जेवियर द्रेज मार्केटिंग और उपभोक्ता शोध के विद्वान हैं।

द्रेज ने यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स से गणितीय अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली के भारतीय सांख्यिकी संस्थान से पीएचडी की। उनका शोध लागत-लाभ विश्लेषण के सैद्धांतिक अर्थशास्त्र पर था।

वे 1979 से भारत में रह रहे हैं। उन्होंने 2002 में भारतीय नागरिकता ली, जिसके लिए बेल्जियम की नागरिकता छोड़नी पड़ी। वे 1993 से 2002 तक दिल्ली में, 2002 से 2014 तक इलाहाबाद में रहे। अब रांची में रहते हैं।

करियर और मौजूदा भूमिकाएं

द्रेज ने 1980 के दशक में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाया। यह उनका इकलौता पूर्णकालिक पद रहा। इसके अलावा उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाया और इलाहाबाद के जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में योजना आयोग की ओर से बनी इकाई में मानद चेयर प्रोफेसर भी रहे।

अभी वे दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मानद प्रोफेसर और रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। वे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं, जिसकी अध्यक्षता नोबेल पुरस्कार विजेता एस्थर डुफ्लो करती हैं। वे यूपीए सरकार के दोनों कार्यकाल में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य रहे।

अमर्त्य सेन के साथ किताबें और शोध

द्रेज ने नोबेल विजेता अमर्त्य सेन के साथ अकाल और भूख पर काम किया है। दोनों की सबसे चर्चित किताबों में हंगर एंड पब्लिक एक्शन और ऐन अनसर्टेन ग्लोरी: इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शंस शामिल हैं। उन्होंने नीति सुधारों पर निकोलस स्टर्न के साथ और एंगस डीटन के साथ भी काम किया है। डीटन भी नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री हैं। उनकी अपनी किताब सेंस एंड सॉलिडेरिटी: झोलावाला इकोनॉमिक्स फॉर एवरीवन भी चर्चित है।

उनका शोध भूख, अकाल, शिक्षा, लैंगिक असमानता, बाल देखभाल, स्कूलों में भोजन और रोजगार गारंटी जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। उनकी खासियत यह मानी जाती है कि वे परंपरागत आर्थिक तरीकों के साथ मानव विज्ञान के तरीके भी इस्तेमाल करते हैं।

इसका बड़ा उदाहरण मुरादाबाद जिले के पालनपुर गांव का अध्ययन है। निकोलस स्टर्न और दूसरे शोधकर्ताओं के साथ किए गए इस काम के लिए द्रेज गांव में स्थानीय लोगों जैसी परिस्थितियों में रहे। उन्होंने खेती की और पशु पाले। इस अनुभव पर नरेश शर्मा के साथ उनका लेख शेयरक्रॉपिंग इन ए नॉर्थ इंडियन विलेज 1996 में जर्नल ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में छपा।

द्रेज उस छोटी टीम का भी हिस्सा थे जिसने 1999 में प्राथमिक शिक्षा पर पब्लिक रिपोर्ट ऑन बेसिक एजुकेशन तैयार की। इसे प्रोब रिपोर्ट कहा जाता है। यह उत्तर भारत के प्रमुख राज्यों में प्राथमिक शिक्षा की हालत का जमीनी अध्ययन था। जमीनी स्तर के विकास विशेषज्ञों के साथ ऐसा व्यापक अध्ययन कम हुआ है, इसलिए यह आज भी अहम संदर्भ माना जाता है।

नीतियों पर असर: मनरेगा, भोजन का अधिकार, आरटीआई

द्रेज भले ही किसी सरकारी पद पर नहीं हैं, लेकिन भारत की कई बड़ी कल्याण नीतियों से उनका नाम जुड़ा है।

पहला नाम राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून यानी नरेगा का है। यह आज महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून यानी मनरेगा के नाम से जाना जाता है। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि इसके पहले मसौदे की परिकल्पना और ड्राफ्टिंग में द्रेज की बड़ी भूमिका रही। यह कानून 2005 में आया और ग्रामीण परिवारों को काम का कानूनी हक देता है।

दूसरा क्षेत्र भोजन का अधिकार है। द्रेज देश के भोजन का अधिकार अभियान के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। इस अभियान ने मांग की कि भोजन को दान नहीं, कानूनी हक माना जाए। कई विश्लेषणों में कहा गया है कि इस अभियान के काम ने 2013 के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को दिशा देने में भूमिका निभाई। यह कानून ज्यादातर परिवारों को रियायती अनाज और स्कूली बच्चों व माताओं को भोजन की गारंटी देता है।

तीसरा क्षेत्र सूचना का अधिकार है। द्रेज उस अभियान से जुड़े रहे जिसके नतीजे में सूचना का अधिकार कानून बना।

उन्होंने आधार को खाद्य और रोजगार से जुड़े हकों के लिए अनिवार्य करने का विरोध भी किया है। उनका एक शोध आधार एंड फूड सिक्योरिटी इन झारखंड: पेन विदाउट गेन नाम से रीतिका खेरा, नजार खालिद और अनमोल सोमांची के साथ प्रकाशित हुआ। इसमें झारखंड में आधार से जुड़े राशन के असर का अध्ययन किया गया।

सादगी भरी जिंदगी

द्रेज अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। पीएचडी के दौरान और उसके बाद उन्होंने कम से कम जरूरतों वाली जीवनशैली अपनाई। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में रहते हुए वे अक्सर सड़क पर सोते थे और बेघर लोगों के साथ रहते थे। उन्होंने 1988 में बेघरों के लिए इमारतें खोलने और बेदखली का विरोध करने वाले एक स्क्वैटर्स आंदोलन को शुरू करने में मदद की। इस पर उन्होंने नंबर वन क्लैफम रोड नाम की छोटी किताब भी लिखी।

फील्ड वर्क के दौरान वे उन्हीं हालात में रहते हैं, जिनमें वे लोग रहते हैं जिन पर वे शोध कर रहे होते हैं। दिल्ली में वे और उनकी पत्नी बेला भाटिया एक झुग्गी में एक कमरे के घर में रहते थे।

उन्होंने शांति आंदोलन में भी हिस्सा लिया। 1990-91 के इराक युद्ध के दौरान वे इराक-सऊदी सीमा पर बने एक शांति शिविर में शामिल हुए। इराक पर 1991 में हंगर एंड पावर्टी इन इराक नाम का उनका लेख खाड़ी युद्ध के बाद इराक की अर्थव्यवस्था के शुरुआती आकलनों में माना जाता है।

हाल का सम्मान

5 जून 2026 को द्रेज को पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में हुए वर्ल्ड इनइक्वालिटी कॉन्फ्रेंस के दौरान ग्लोबल इनइक्वालिटी रिसर्च अवार्ड दिया गया।

द्रेज अहम क्यों हैं

द्रेज की अहमियत की पहली वजह यह है कि वे शोध और जमीनी काम दोनों करते हैं। अर्थशास्त्र की दुनिया में कम लोग गांवों में रहकर आंकड़े जुटाते हैं और उसी अनुभव को नीतिगत बहस में रखते हैं। उनके शोध की ताकत इसी तरीके में मानी जाती है।

दूसरी वजह यह है कि उनके काम का असर कानूनों और योजनाओं पर दिखता है। रोजगार का हक, भोजन का हक और जानकारी का हक, तीनों आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़े हैं। इन तीनों बहसों में उनकी मौजूदगी रही है।

तीसरी वजह यह है कि वे सत्ता और नीति पर सवाल उठाने से हिचकते नहीं। आधार पर उनके शोध और आलोचना इसका उदाहरण हैं। चाहे समर्थक उन्हें सही मानें या आलोचक उनसे असहमत हों, उनकी बातें नीतिगत बहस का हिस्सा बनती रही हैं।

चौथी वजह उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान है। अमर्त्य सेन, निकोलस स्टर्न और एंगस डीटन जैसे अर्थशास्त्रियों के साथ उनका काम दुनिया भर के विकास अर्थशास्त्र में पढ़ा जाता है।

इस घटना में भी यही बात दिखी। जब पुलिस ने उन्हें रिहा करने की पेशकश की, तो उन्होंने अकेले जाने से मना कर दिया। उनके साथ हिरासत में लिए गए लोग ज्यादातर आम मजदूर और काम से निकले लोग थे। द्रेज ने कहा कि या तो सब छूटेंगे या कोई नहीं। इसी वजह से यह घटना सिर्फ एक जाने-माने चेहरे की हिरासत की खबर नहीं रही।

आगे क्या

फिलहाल दिल्ली पुलिस की ओर से द्रेज और दूसरे हिरासत में लिए गए लोगों के आरोपों पर कोई सार्वजनिक जवाब इन रिपोर्टों में नहीं मिला है। CJP के नेताओं को अदालत से रिहाई मिल चुकी है, पर प्रदर्शन, उसके दौरान की पाबंदियों और हिरासत की कार्रवाई पर बहस जारी है।

यहां ध्यान रखना जरूरी है कि हिरासत में लिए गए लोगों के आरोप अभी उनके अपने बयान हैं। पुलिस का पक्ष सामने आने पर तस्वीर और साफ होगी। तब तक जो बात दर्ज है, वह यह है कि द्रेज और तीन साथियों को पोस्टर के साथ खड़े होने पर हिरासत में लिया गया और सभी हिरासती लोगों के छूटने के बाद ही वे थाने से निकले।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *