मां शैलपुत्री कौन हैं? नवरात्रि के पहले दिन पूजा क्यों?
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। जानें उनका नाम, स्वरूप, कथा, मंत्र, पूजा विधि और महत्व से जुड़ी हर जरूरी बात।
Navrati 2026 मां शैलपुत्री। Google Gemini से फोटो बनाई गई है।
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है। इन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। पहले दिन की देवी हैं मां शैलपुत्री। नीचे उनसे जुड़े सभी जरूरी सवालों के जवाब दिए गए हैं।
मां शैलपुत्री का नाम का क्या अर्थ है?
“शैल” का मतलब है पर्वत और “पुत्री” का मतलब है बेटी। इस तरह शैलपुत्री का अर्थ हुआ पर्वत की पुत्री। मान्यता है कि वे हिमालय राज की बेटी के रूप में जन्मी थीं, इसलिए उन्हें यह नाम मिला।
मां शैलपुत्री की पौराणिक कथा क्या है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार मां शैलपुत्री को देवी सती का पुनर्जन्म माना जाता है। कथा के मुताबिक राजा दक्ष की बेटी सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन उसमें शिव को आमंत्रित नहीं किया। इसके बावजूद सती बिना बुलाए उस यज्ञ में पहुंचीं, जहां दक्ष ने शिव का अपमान किया। यह अपमान सती सहन नहीं कर पाईं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में खुद को समर्पित कर दिया।
मान्यता है कि अगले जन्म में सती ने हिमालय राज और उनकी पत्नी मैना के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसी वजह से उन्हें शैलपुत्री कहा गया। आगे चलकर उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को फिर से अपने पति के रूप में प्राप्त किया।
मां शैलपुत्री का स्वरूप कैसा है?
मान्यता के अनुसार मां शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल होता है। उनका वाहन बैल यानी नंदी है, इसलिए उन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। उनका रूप शांत और करुणामयी माना जाता है।
मां शैलपुत्री को नवदुर्गा में पहला स्थान क्यों मिला है?
नवरात्रि के पहले दिन की पूजा शक्ति की शुरुआत मानी जाती है। चूंकि मां शैलपुत्री को आदिशक्ति का पहला स्वरूप माना जाता है, इसलिए नवदुर्गा में उन्हें सबसे पहला स्थान दिया गया है। मान्यता है कि यहीं से नौ दिनों की साधना की शुरुआत होती है।
मां शैलपुत्री का ज्योतिष से क्या संबंध है?
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री का संबंध चंद्रमा ग्रह से माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर या अशुभ स्थिति में हो, उनके लिए मां शैलपुत्री की उपासना करना शुभ माना जाता है।
मां शैलपुत्री किस चक्र से जुड़ी हैं?
योग और तंत्र साधना की मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री का संबंध मूलाधार चक्र से जोड़ा जाता है। मूलाधार चक्र को शरीर की ऊर्जा का आधार माना जाता है, इसलिए साधना की शुरुआत भी इसी चक्र से मानी जाती है।
मां शैलपुत्री की पूजा विधि क्या है?
परंपरा के अनुसार नवरात्रि के पहले दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं। घर के मंदिर में कलश स्थापना की जाती है, जिसे घटस्थापना कहा जाता है। मां शैलपुत्री की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाया जाता है और सफेद या हल्के रंग के फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद मंत्र जाप, आरती और भोग अर्पित करने की परंपरा है।
मां शैलपुत्री का मंत्र क्या है?
मां शैलपुत्री के लिए यह मंत्र प्रचलित है:
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।
इसके अलावा बीज मंत्र के रूप में ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः का जाप भी किया जाता है।
मां शैलपुत्री को कौन सा रंग और भोग पसंद है?
नवरात्रि के पहले दिन परंपरागत रूप से पीला या सफेद रंग पहनने की मान्यता है। भोग के तौर पर गाय के घी से बनी चीजें अर्पित करने की परंपरा है, क्योंकि इसे शुद्धता और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है।
मां शैलपुत्री की पूजा से क्या लाभ मिलता है?
ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री की उपासना से मन को स्थिरता, संयम और आंतरिक शक्ति मिलती है। मान्यता है कि यह पूजा साधक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का मार्ग खोलती है और आने वाले आठ दिनों की साधना के लिए आधार तैयार करती है।