पाकिस्तान के प्रतिबंधों की असली वजह सिर्फ पेट्रोल की कमी नहीं, कुछ और है

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पाकिस्तान में लॉकडाउन जैसे हालत पैदा हो गए हैं। सरकार ईंधन संकट से निपटने की राह तैयार कर रही है।

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पाकिस्तान सरकार ने अचानक ऐसे कड़े नियम लागू कर दिए हैं जो देखने में लॉकडाउन जैसे लगते हैं। दुकानें रात 9 बजे बंद, सरकारी अफसरों की विदेश यात्रा पर तीन महीने की रोक, नई गाड़ियां खरीदने पर पाबंदी।

सरकार इसे ईंधन बचाने का कदम बता रही है, लेकिन गहराई से देखें तो कहानी सिर्फ पेट्रोल-डीजल की नहीं है। यह पाकिस्तान की कमजोर होती अर्थव्यवस्था और घटते विदेशी मुद्रा भंडार की चेतावनी भी है।आखिर हुआ क्या है?

पाकिस्तान की संघीय सरकार ने एक नई किफायत (ऑस्टेरिटी) नीति लागू की है, जिसके तहत सबसे पहले इस्लामाबाद में दुकानें, बाज़ार, मॉल, डिपार्टमेंटल स्टोर और किराना दुकानें रात 9 बजे तक बंद करनी होंगी। सरकार चाहती है कि बाकी राज्य भी इसी तरह के नियम अपनाएं।

शादी-विवाह के हॉल और मैरिज गार्डन रात 10 बजे बंद करने होंगे, और शादियों में अब सिर्फ एक ही डिश परोसी जा सकेगी। रेस्टोरेंट और कैफे रात 11 बजे तक खुले रह सकते हैं, जबकि होम-डिलीवरी और टेकअवे को छूट दी गई है। दवा की दुकानें, अस्पताल, पेट्रोल पंप और सीएनजी स्टेशन जैसी ज़रूरी सेवाओं को इन पाबंदियों से बाहर रखा गया है।

पाबंदियां अचानक क्यों लगानी पड़ीं?

इसकी सीधी वजह है, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेज़ उछाल। 17 सितंबर से पाकिस्तान में पेट्रोल 6.88 रुपये महंगा होकर 391.22 रुपये प्रति लीटर और हाई-स्पीड डीज़ल 5.62 रुपये बढ़कर 421.45 रुपये प्रति लीटर हो गया है।

इसके पीछे मिडिल ईस्ट का संकट है ईरान से जुड़े टकराव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होने वाली शिपिंग में रुकावटों की वजह से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है।

पाकिस्तान अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर तेल और गैस बाहर से मंगाता है, इसलिए दुनिया में जब भी तेल महंगा होता है, इसका सबसे बुरा असर पाकिस्तान जैसे आयात पर निर्भर देश पर पड़ता है। साथ ही, ईरान-अमेरिका के बीच जून में हुआ संघर्षविराम टूटने और सऊदी अरब के नागरिक व आर्थिक ढांचे पर हूती हमलों ने क्षेत्रीय तनाव और बढ़ा दिया है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति में और रुकावट की आशंका पैदा हो गई है।

सरकारी खर्चों पर भी सीधी कैंचीयह सिर्फ आम जनता के लिए नहीं है, सरकार ने खुद अपने खर्चों में भी भारी कटौती की है। सरकारी विभागों के लिए किसी भी तरह की नई गाड़ी खरीदने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है, साथ ही आईटी को छोड़कर टिकाऊ सामान की खरीद पर भी पाबंदी है।

सरकारी गाड़ियों को मिलने वाला फ्यूल कोटा अगले तीन महीनों के लिए आधा कर दिया गया है। हालांकि सेना, कानून-व्यवस्था और ज़रूरी सेवाओं की ऑपरेशनल गाड़ियों को छूट दी गई है।सरकारी अफसरों की विदेश यात्रा पर तीन महीने का पूरी तरह बैन लगाया गया है।

गैर-ज़रूरी सरकारी खर्च में हर महीने 5% की कटौती का आदेश दिया गया है।

सवाल, क्या यह सिर्फ ईंधन बचाने की कोशिश है?

सरकार भले ही इसे एनर्जी-कंज़र्वेशन प्लान बता रही हो, लेकिन जिस तरह से एक साथ दुकानों के समय से लेकर मंत्रियों की विदेश यात्रा तक सब कुछ रोका जा रहा है, वह असल में एक गहरे आर्थिक संकट का संकेत है। जंग न तो पाकिस्तान लड़ रहा है, न उसकी ज़मीन पर हो रही है फिर भी मिडिल ईस्ट में तेल की कीमतें बढ़ते ही पाकिस्तान की सरकार को अपने ही नागरिकों पर पाबंदियां लगानी पड़ रही हैं।

यही पाकिस्तान की असली कमज़ोरी दिखाता है: उसका विदेशी मुद्रा भंडार इतना पतला है कि तेल का हर झटका सीधे उसकी जेब पर असर डालता है, और सरकार के पास इससे निपटने के लिए बाज़ार और नागरिकों की आज़ादी सीमित करने के अलावा कोई तुरंत रास्ता नहीं बचता।

यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी 2023 और अप्रैल 2026 में पाकिस्तान ऐसे ही किफायत कदम उठा चुका है, जब भी वैश्विक तेल बाज़ार में उथल-पुथल हुई। यानी यह कोई एक बार की आपात व्यवस्था नहीं, बल्कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का एक बार-बार लौटने वाला पैटर्न बन चुका है।

हर वैश्विक झटके पर देश को अपनी रोज़मर्रा ज़िंदगी सीमित करनी पड़ती है।अभी ये पाबंदियां इस्लामाबाद तक सीमित हैं, लेकिन सरकार पूरे देश में इन्हें लागू करने की उम्मीद कर रही है। आने वाले हफ्तों में देखना होगा कि बाकी राज्य इसे अपनाते हैं या नहीं, और क्या मिडिल ईस्ट का तनाव कम होता है या और बढ़ता है।

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