सॉलिप्सिज़्म दर्शन क्या है? अर्थ, सिद्धांत और ‘स्व’ की दार्शनिक अवधारणा समझिए
सारी दुनिया मेरे भीतर है। मैं दुनिया को महसूस करता हूँ। मेरी चेतना से ही दुनिया का अस्तित्व है। यहीं से जन्मता है ‘सॉलिप्सिज़्म विचार’ का सिद्धांत। क्या आपने भी कभी सोचा है कि कहीं ऐसा तो नहीं हम किसी स्वप्न में हैं और बस हकीकत का भ्रम मात्र है। सॉलिप्सिज़्म कहता है कि क्या मैं ये जान सकता हूँ कि हकीक़त में दुनिया मौज़ूद है या यह सब मेरा मन है, मन का भ्रम है।
सॉलिप्सिज़्म ऐसा दर्शन है जिसको तर्कों से झुठलाया भी नहीं जा सकता और इसके उत्तर भी ठीक – ठीक नहीं मिलते। इसका मूल यह है कि हम अन्य व्यक्ति की चेतना को महसूस नहीं कर सकते, महसूस करने का कोई उपाय ही नहीं है। किसी व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है, हम बस अपने अनुभवों के आधार पर अनुमान ही लगा सकते हैं। सोचिए कि आप गहरी निद्रा में हैं। आप एक ख़्वाब देख रहे हैं कि आप सड़क पर खड़े हैं। आपके सामने से एक व्यक्ति आ रहा है।
सड़क के किनारे बड़े – बड़े घर बने हुए हैं। आप को लोगों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। अचानक से निद्रा टूटती है और स्वप्न भी टूट जाता है। पर सपने में तो सारी चीजें हकीकत मालूम पड़तीं थीं। हकीकत यह है कि आप बस अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे।
स्वप्न में बस हमारी ख़ुद की चेतना थी और जो लोग थे, चीजें थीं वो बस हमारी चेतना द्वारा बनाये गए काल्पनिक पात्र बस थे। कहीं हमारी बाहरी दुनिया भी तो हमारी चेतना के काल्पनिक पात्र भर तो नहीं। अब सवाल उठता है कि जैसे दूसरे लोग हमारी चेतना की कल्पना मात्र हैं, क्या हम भी किसी अन्य व्यक्ति की कल्पना तो नहीं। उत्तर हैं हाँ बिल्कुल ऐसा हो सकता है। यहाँ आकर सॉलिप्सिज़्म एक शीशे की तरह हो जाती है। शंकर का अद्वैत वेदांत भी कुछ सॉलिप्सिज़्म से मिलता – जुलता है। अद्वैत वेदांत कहता है – अहम् ब्रह्मास्मि। अर्थात् मैं ब्रह्म हूँ। अद्वैत वेदान्त में फ़र्क़ यह है कि यह कहता है कि आत्मा ही अंतिम सत्य है, ब्रह्म ही अंतिम सत्य है। यह चेतना को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं मानता। जबकि सॉलिप्सिज़्म कहता है कि बस हमारी चेतना है और चेतना से रची गई काल्पनिक दुनिया। यहीं से अद्वैत वेदान्त और सॉलिप्सिज़्म के रास्ते बँट जाते हैं।लिखने को बहुत कुछ है, मन में बहुत कुछ है।