बीजेपी के साथ रहते हुए संजय निषाद अपनी राजनीतिक कीमत कैसे बढ़ा रहे हैं?

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आरक्षण की मांग, सीट बंटवारे पर बेचैनी और विपक्षी नेता से मुलाकात के बीच निषाद पार्टी की सौदेबाजी की ताकत को लेकर यूपी की सियासत में चर्चा तेज।

Sanjay Nishad

निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद।

योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद 2027 विधानसभा चुनाव से पहले लगातार सुर्खियों में हैं। एक तरफ वे सरकार का हिस्सा हैं, तो दूसरी तरफ अपनी ही सरकार से जुड़े मुद्दों पर तीखे बयान भी दे रहे हैं। पिछले कुछ हफ्तों में उनकी सक्रियता ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि सत्ता में रहते हुए वे बीजेपी पर कितना दबाव बना सकते हैं।

हाल ही में गोंडा में एक व्यापारी विनोद कुमार साहनी की हत्या के बाद संजय निषाद प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठे थे। इसके कुछ ही दिन बाद उन्होंने 15 सितंबर 2026 को सपा नेता और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात की, जिसके अगले दिन ही उन्होंने सपा पर तीखा हमला भी बोला। यह अंतर्विरोध उनकी मौजूदा राजनीति को समझने की कुंजी है और यही इस खबर का केंद्र बिंदु है।

संजय निषाद कौन हैं और निषाद पार्टी कैसे बनी

डॉ. संजय निषाद मूल रूप से निषाद आरक्षण आंदोलन से जुड़े रहे हैं। उन्होंने निषाद समुदाय के आरक्षण और सामाजिक अधिकारों की मांग को लेकर एक राजनीतिक दल की जरूरत महसूस की, जिसके बाद निषाद पार्टी यानी निर्बल भारतीय शोषित हमारा आम दल अस्तित्व में आई। पार्टी का मुख्य सामाजिक आधार निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, मांझी और इससे जुड़ी नदी किनारे व मछुआरा जातियां मानी जाती हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समुदाय को इसलिए अहम माना जाता है क्योंकि यह पूर्वांचल और गंगा-यमुना किनारे के कई जिलों में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहा है।

बीजेपी के साथ गठबंधन और सत्ता तक का सफर

2018 में गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद ने सपा के टिकट पर बीजेपी को हराया था, जो निषाद पार्टी की चर्चा में आने की बड़ी वजह बनी। इसके बाद 2019 में निषाद पार्टी बीजेपी के साथ आ गई और तभी से यह गठबंधन जारी है। 2022 विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद संजय निषाद को योगी आदित्यनाथ के दूसरे कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री बनाया गया।

सितंबर 2026 तक की मौजूदा स्थिति

सितंबर 2026 तक डॉ. संजय निषाद उत्तर प्रदेश सरकार में मत्स्य पालन मंत्री हैं और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। उनकी पार्टी अब भी बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा है। मत्स्य विभाग उनके सामाजिक आधार के लिहाज से प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि पार्टी जिन समुदायों का प्रतिनिधित्व करती है, उनका परंपरागत जुड़ाव नदी, तालाब और नाव संचालन से रहा है।

बीजेपी पर दबाव की राजनीति

बीते कुछ महीनों में संजय निषाद ने कई मौकों पर अपनी ही सरकार के सामने सवाल उठाए हैं। अगस्त 2026 में उन्होंने बयान दिया कि निषाद समाज को आरक्षण मिल जाए तो इसके बदले उनका मंत्री पद भी ले लिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी सत्ता या कुर्सी की भूखी नहीं है, बल्कि समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। यह उनका अपना बयान है, न कि कोई सरकारी घोषणा।

इसके अलावा जून 2026 में गाजीपुर में कमलेश बिंद के एनकाउंटर और हाल ही में गोंडा में विनोद कुमार साहनी की हत्या पर भी उन्होंने प्रशासन की खुलकर आलोचना की। सितंबर 2026 में सीट बंटवारे को लेकर उन्होंने भाजपा से मांग की कि जिन सीटों पर पार्टी कभी नहीं जीती और जो निषाद-बिंद बहुल हैं, वे सीटें निषाद पार्टी को दी जाएं। मीडिया रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि उन्होंने कई मौकों पर संकेत दिया है कि अगर उचित सम्मान नहीं मिला तो उनके पास दूसरे राजनीतिक विकल्प भी खुले हैं। इसे उन्होंने खुद गठबंधन तोड़ने की घोषणा नहीं बताया है।

संजय निषाद की राजनीतिक ताकत

संजय निषाद की सौदेबाजी की ताकत मुख्य रूप से निषाद समुदाय की सामाजिक मौजूदगी से आती है। पार्टी और उससे जुड़े नेताओं के अनुसार निषाद-मल्लाह-बिंद समाज पूर्वांचल के दर्जनों विधानसभा क्षेत्रों में असर डालने की स्थिति में है, हालांकि इस आबादी और सीटों के प्रभाव को लेकर अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग आंकड़े दिए गए हैं और इन्हें पार्टी के अपने दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। 2022 चुनाव में गठबंधन के तहत मिली सीटों पर पार्टी ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया था, जिससे बीजेपी नेतृत्व के भीतर भी उसकी अहमियत बनी रही।

राजनीतिक कमजोरी क्या है?

हालांकि निषाद पार्टी का संगठनात्मक असर पूरे उत्तर प्रदेश में एक समान नहीं है। यह मुख्य रूप से पूर्वांचल और नदी किनारे के कुछ जिलों तक सीमित माना जाता है। विकिपीडिया पर उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार 2022 विधानसभा चुनाव में निषाद पार्टी ने करीब 16 से 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से उसे 6 सीटों पर जीत मिली और उसका वोट प्रतिशत लगभग 0.91 रहा। यह आंकड़ा दिखाता है कि पार्टी की स्वतंत्र चुनावी ताकत सीमित है और वह काफी हद तक बीजेपी के गठबंधन और सीटों के बंटवारे पर निर्भर है। इसके अलावा सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दल भी निषाद-मल्लाह समुदाय को साधने की कोशिश करते रहे हैं, जिससे यह वोट बैंक पूरी तरह एकजुट नहीं है। लंबे समय से लंबित आरक्षण की मांग भी पार्टी के लिए राजनीतिक दबाव का एक बड़ा कारण बनी हुई है।

क्या किंगमेकर बनने की कोशिश?

राजनीति में किंगमेकर उस भूमिका को कहा जाता है जब कोई छोटा दल अपनी सीटों या समर्थन के दम पर यह तय करने की स्थिति में आ जाए कि सरकार किसके नेतृत्व में बनेगी। संजय निषाद के हालिया बयानों, आरक्षण की मांग, सीट बंटवारे पर सख्ती और विपक्षी नेता से मुलाकात को देखकर कुछ राजनीतिक विश्लेषक और मीडिया रिपोर्टें यह सवाल उठा रही हैं कि क्या वे अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यह एक राजनीतिक विश्लेषण और अटकल है, स्थापित तथ्य नहीं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभी यह साबित नहीं होता कि वे बीजेपी गठबंधन छोड़ने या किंगमेकर बनने की ठोस रणनीति पर चल रहे हैं। संजय निषाद ने खुद सीट बंटवारे पर नाराजगी की अटकलों से इनकार किया है।

2027 में कितनी सीटों की मांग

2022 चुनाव में एनडीए गठबंधन के तहत निषाद पार्टी को बीजेपी से 16 सीटें मिली थीं, जिनमें से 6 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार बीजेपी के चुनाव चिह्न पर लड़े थे और बाकी पर पार्टी के अपने चुनाव चिह्न पर। इनमें से पार्टी को कुल 6 सीटों पर जीत मिली थी। 2027 चुनाव के लिए सितंबर 2026 में संजय निषाद ने कहा है कि पार्टी जहां कम वहां हम फॉर्मूले पर बीजेपी से सीटों की बात कर रही है, यानी जिन सीटों पर बीजेपी कभी नहीं जीती और जो निषाद-बिंद बहुल हैं, वे सीटें पार्टी को दी जाएं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि एनडीए के भीतर सीट बंटवारे को लेकर फिलहाल कोई मतभेद नहीं है। अलग-अलग रिपोर्टों में सीटों की सटीक संख्या को लेकर अभी कोई एक जैसी और अंतिम जानकारी सामने नहीं आई है।

संजय निषाद की राजनीति किस करवट?

सितंबर 2026 के घटनाक्रम को देखें तो संजय निषाद एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय दिखते हैं। वे बीजेपी गठबंधन में बने हुए हैं और सरकार में मंत्री भी हैं, लेकिन साथ ही आरक्षण की मांग और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर अपनी सरकार से अलग रुख भी अपनाते रहे हैं। सपा नेता माता प्रसाद पांडेय से उनकी मुलाकात को लेकर कई मीडिया रिपोर्टों में यह बताया गया है कि यह मुलाकात शिष्टाचार भेंट थी, क्योंकि पांडेय की तबीयत ठीक नहीं थी। इस मुलाकात को लेकर अब तक कोई आधिकारिक राजनीतिक बयान या गठबंधन बदलने का संकेत सामने नहीं आया है, हालांकि चुनावी साल में इसे लेकर अटकलें जरूर तेज हुई हैं। इसे किसी निश्चित राजनीतिक दिशा का प्रमाण मानना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

निषाद पार्टी कैसे बनी थी?

निषाद पार्टी की स्थापना निषाद आरक्षण आंदोलन से निकली थी और शुरुआती वर्षों में पार्टी ने पीस पार्टी के साथ मिलकर 2017 विधानसभा चुनाव लड़ा था। 2018 के गोरखपुर उपचुनाव में सपा के साथ मिलकर बीजेपी को हराने के बाद पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई, लेकिन यह गठबंधन एक साल में ही टूट गया। इसके बाद से निषाद पार्टी लगातार बीजेपी गठबंधन का हिस्सा रही है और 2022 में सत्ता में हिस्सेदारी के तौर पर संजय निषाद को कैबिनेट मंत्री बनाया गया।

निषाद समुदाय के लिए अनुसूचित जाति दर्जे और आरक्षण की मांग पार्टी की शुरुआत से ही केंद्रीय मुद्दा रही है और यह मांग अब तक पूरी नहीं हुई है, जो पार्टी और बीजेपी के रिश्तों में समय-समय पर तनाव की वजह बनती रही है।

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