काश! मैं एक नालायक बेटा होता

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बेटों की सफलता और असफलता की कहानी, उनकी नजरों में कैसी होती है, मृत्युंजय शुक्ल की कहानी ‘काश मैं एक नालायक बेटा होता’ में झलकती है।

Mrityunjay Shukla Ki Kahani

मृत्युंजय शुक्ल की कहानी, काश मैं नालायक बेटा होता।

इंटरमीडिएट का रिजल्ट आया। हर बार की तरह इस बार भी रवि ने ही टॉप किया था। कक्षा पांच से लेकर अब तक का रिकॉर्ड रहा था, रवि ही अपनी क्लास टॉप करता था। एक आदर्श विद्यार्थी के पांचों लक्षण विद्यमान थे उसके अंदर।

अपने घर से करीब 20 किलो मीटर दूर शोहरतगढ़ में रूम लेकर वह रहता था। छुट्टी जब कभी लगातार चार दिन की होती थी तब ही शायद वो घर जा पाता था, नहीं तो उसे पढ़ने से ही फुर्सत कहां थी। शायद इसी परिश्रम और त्याग का ही परिणाम था कि इंटरमीडिएट में भी रवि ने इतने अच्छे अंक प्राप्त किए थे।

आगे की कहानी बताने से पहले मैं उसके घर की स्थिति के बारे में बता देता हूं कि एक मिडिल क्लास फैमिली से था रवि। उसके पापा दिल्ली में एक होटल में काम करते थे। महीने में करीब 12,000 रुपये तो आराम से ही पा जाते थे।

उसकी मां गांव में ही सिलाई का काम करती थीं। वे भी कुछ नहीं तो 150 रुपये रोज का कमा ही लेती थीं और घर का सारा काम काज भी उसकी मां ही करती थीं। गांव के उत्तर साइड में उसका घर था।

परीक्षा की छुट्टी के बाद वो अपने घर आया हुआ था। उसके पापा भी कुछ दिन की छुट्टी लेकर के घर आए थे। उसकी दो छोटी बहनें भी थीं। एक इंटर फर्स्ट ईयर में थी और दूसरी 8वीं में थी। शाम के साढ़े 6 बज गए थे उसकी मां आंगन में चाय बना रही थीं। दोनों बहनें कमरे में बैठ कर पढ़ रही थीं। रवि और उसके पापा अपने द्वारे कुर्सी लगा के बैठे थे।

चाय का इंतजार कर रहे थे।

“रवि! आओ चाय ले जाओ और अपने पापा का कप भी लिए जाओ।” उसकी मां ने रवि को बुलाते हुए कहा।

उसके घर के सामने किसी का घर ही नहीं था। यही वजह थी शाम को उसके चौखट पर हवा बहुत अच्छी आती थी।

“हां मम्मी।।।आ गया।” कहते हुए रवि घर में गया और उधर से दोनों कप लेके आया। दूसरा कप अपने पापा को दिया और फिर आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। दोनों चाय पी रहे थे। शाम धीरे धीरे रात की तरफ बढ़ती चली जा रही थी।

“बेटा अब आगे क्या करने का इरादा है? कुछ भी करना सोच समझकर ही करना क्योंकि तुम्हें तो पता ही है, आजकल मेरी तबीयत सही नहीं चल रही है। 50 के करीब उम्र हो चली है और हार्ट की बीमारी भी कमबख्त बहुत बुरी बीमारी है। क्या पता, कब ऊपर वाला याद कर ले।”
कहते हुए पापा चुप हो गए।

रवि समझ नहीं पा रहा था कि उसके पापा इस तरह क्यों बोल रहे हैं। वह चुप रहा कुछ नहीं बोला।

कुछ देर बाद रवि ने पापा की तरफ देखते हुए कहा, “पापा आप तो जानते ही हैं, बचपन से ही सिविल सर्विसेज की परीक्षा निकालने का ही सपना देखता हूं और ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद मेरा एकमात्र लक्ष्य यही रहेगा।”

कुछ देर तक दोनों ऐसे ही बैठे रहे, चाय खत्म हो चुकी थी। आज उसके पापा की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी।
पर वो इस बात को जाहिर नहीं कर रहे थे, जैसे उन्हें किसी घटना का पूर्वानुमान हो गया था।

रवि को वो परिवार की जिम्मेदारी का आभास कराना चाह रहे थे। उनकी सारी बातों का सार यही था कि मेरे बाद इस परिवार के मुखिया तुम्हीं रहोगे।

रात के 9 बज चुके थे। खाना तैयार हो चुका था। ऐसे ही दिन बीतते चले जा रहे थे। जब से रवि के पापा दिल्ली से आए थे वे परेशान ही रहते थे। परेशानी का कुछ कारण तो उनकी बीमारी थी जो धीरे धीरे पांव पसार रही थी लेकिन रवि को लेके भी कुछ तनाव उनके दिमाग में चल रहा था।

रवि का जिगरी दोस्त हासिम भी बगल के गांव में ही रहता था। वह भी आजकल रवि से मिलने आ जाया करता था।

हासिम पढ़ाई में बहुत ठीक नहीं था लेकिन व्यावहारिक ज्ञान बहुत था उसके पास। दोनों की दोस्ती बहुत बचपन से ही थी।

हासिम का बड़ा भाई अरबाज था जो परदेश में रहता था। हासिम और रवि की दोस्ती की वजह से एक-दूसरे के घर वालों का भी आना-जाना लगा रहता था या यूं कहिए कि इन दोनों की दोस्ती की वजह से ही रवि के पापा और हासिम के अब्बू जान भी अच्छे दोस्त हो गए थे।

हासिम के अब्बू जान की भी तबीयत अच्छी नहीं रहती थी इसीलिए हासिम परदेस कमाने नहीं गया था। उसने गांव में ही एक दुकान खोल रखी थी। गांव में रहकर वो कुछ पैसे भी कमा लेता और अपने अब्बू जान की देखभाल भी किया करता था।

रवि के पापा हमेशा हासिम के अब्बू जान से कहा करते थे, “भाईसाहब! आपका बेटा तो श्रवण कुमार है।”

उनके जवाब में हासिम के अब्बू जान हमेशा यही कहते, ”शुक्र है कि हासिम नालायक है अगर लायक होता तो अरबाज की तरह गांव घर से मतलब नहीं रखता। ऊपर वाला सबको हासिम की तरह ही बेटा दे।”

रवि की मां बहुत भोली भाली थीं। रवि के पापा जो कह देते वही उनके लिए सर्वोपरि होता था लेकिन बहुत महत्वाकांक्षी भी थीं। कभी भी उनके घर किसी मेहमान का आवभगत करना हो या किसी को कुछ दान या उधार देना हो हमेशा आगे ही रहती थीं।

इधर रवि के पापा का दिल्ली जाने का समय नजदीक आ रहा था। उनकी छुट्टी लगभग बीत रही थी।

“सुनती हो!” रवि के पापा, रवि की मां को बुलाते हुए बोले।

“हां जी बोलिए!” वे उनके पास बैठते हुए बोलीं।

“मुझे एक बात की चिंता खाए जा रही है कि जिंदगी का क्या भरोसा, रहूं या न रहूं।

मैंने अपने बेटियों के नाम कुछ कागजात कर दिए हैं जमीन के। दोनों की शादी में जो बिक जाएगी। इसके अलावा और कोई रास्ता भी तो नहीं और मेरे हिसाब से रवि को भी ग्रेजुएशन के बाद कोई छोटी-मोटी नौकरी कर ही लेनी चाहिए क्योंकि अगर मुझे कुछ हो गया तो तुम लोगों की देखभाल रवि को ही करनी होगी।”

रवि की मां की आंखों में आंसू थे, शायद भावुक हो गई थीं।

किसी कॉलेज से बैचलर ऑफ आर्ट्स(बीए) का फॉर्म भरकर रवि ने प्रयागराज में जाकर तैयारी करने की इच्छा जताई अपने पिता से।

“ठीक है अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो जाओ। ”मैं पैसे का इंतजाम करता रहूंगा” उसके पापा कुर्सी पर बैठते हुए बोले।

वो दिन भी आ गया जब रवि को प्रयागराज जाना था तैयारी के लिए। सुबह का वक्त था। सूरज की हल्की लाल रोशनी उसके आंगन में आ रही थी। सुबह की ताजी हवा अपने ही धुन में चली जा रही थी। उसकी एक बहन उसके लिए चाय लेकर खड़ी थी और मां उसका बैग पैक कर रही थीं।

पापा रेडियो पर सुबह का भजन सुन रहे थे लेकिन रवि अपने कैरियर को लेकर इतना गंभीर था कि उसे न प्रकृति का सौन्दर्य दिखता था और न ही परिवार का समर्पण भाव। चाय नाश्ता करते सुबह के 7 बज गए। आठ बजे ही चौराहे पर से उसे बस पकड़नी थी प्रयागराज के लिए। चौराहा उसके घर से डेढ़ किलो मीटर रहा होगा तकरीबन।

रवि को बस तक पहुंचाने के लिए हासिम साइकिल लेकर बाहर खड़ा था। अब निकलने का समय हो चुका था।

“और पैसे तुम्हारे वहां पहुंचने के बाद तुम्हारे अकाउंट में भिजवा दूंगी इंतजाम करके।” उसकी मां ने उसके जेब में कुछ रुपये डालते हुए कहा।
मां के पैर छूते हुए रवि घर से बाहर निकला जहां हासिम खड़ा था।

सड़क तक पहुंचाने उसके पापा उसके साथ ही गए।

“अच्छा पापा! चलता हूं” अपने पापा के पैर छूते हुए वह आगे बढ़ा।

“ठीक है, पहुंच के फोन करना और बाकी पैसे कुछ दिन में भिजवा दूंगा।” यह कहते हुए उसके पापा घर की तरफ लौटे।
दो दिन बाद उनको भी दिल्ली के लिए प्रस्थान करना था।

ये दो दिन भी बीते और अब रवि के पापा का भी दिल्ली जाने का समय आ गया था।

लेकिन यह क्या? प्रकृति को तो कुछ और ही मंजूर था। अचानक ही रवि के पापा की तबीयत खराब हो गई। भागे-भागे डॉक्टर के पास ले जाया गया। डॉक्टर ने कुछ दवा तो दिया ही लेकिन वे हार्ट के मरीज थे सो तनाव करने से ही शायद इनकी तबीयत बिगड़ जाती थी।

दिल्ली जाना टल गया। ऐसे हालात में कैसे कोई जाने दे। दिन बीतते गए रवि के पापा की तबीयत बिगड़ी ही जा रही थी। उन्हें उचित देखभाल की जरूरत थी। उनकी पत्नी और दोनों बेटियां उनका ख्याल खूब अच्छे से रखती थीं लेकिन कहीं न कहीं उनके दिमाग में रवि के रूप में हासिम जैसे एक नालायक बेटे की कमी खल रही थी, जिसने अपने मां बाप के लिए अपने करियर तक को दांव पर लगा दिया था।

आखिर उनका पूर्वानुमान अपनी मृत्यु का सही लगने लगा। परन्तु वो इस बात को प्रकट नहीं करते थे।

इसी बीच पैसे की सारी जिम्मेदारी रवि के मां के ऊपर आ गई थी। किसी तरह घर चल रहा था। सिलाई भी ज्यादा करने लगी थीं लेकिन आर्थिक स्थिति फिर भी ज्यों की त्यों ही रहती। रवि को पैसे, कहीं न कहीं से कर्ज लेकर जरूर भेजतीं।

और, उन्होंने अपना पूरब वाला खेत भी रवि के नाते बेच दिया था। उसकी फीस की वजह से।

चार साल बीत गए इसी तरह। रवि के पापा के तबीयत का उतार-चढ़ाव सतत् बना रहा। कुछ नहीं बदला। बदला तो बस एक चीज कि कर्ज थोड़ा और बढ़ गया था रुपयों का।

रवि भी अभी तैयारी ही कर रहा था।

अचानक से उनके मन में अपनी बेटियों की शादी का ख्याल आया क्योंकि शायद उन्हें डर था कि कहीं मुझे कुछ हुआ तो इनका क्या होगा।

किसी तरह से शादी खोजी गई और दोनों बेटियों की शादी एक ही साल के अंदर उनके नाम की जमीन बेच कर संपन्न कर दी गई।

रवि भी आया था शादी में लेकिन ऐसे आया था जैसे कोई मेहमान आता है। जैसे उसका घर है ही नहीं यहां।

दोनों बेटियां विदा हो चुकी थीं। रवि तो प्रयागराज में ही था।

घर, सिर्फ रवि की मां और पापा ही बचे। रात हो चली थी। उसके पापा आंगन में एक खाट पर सोए थे। घर का आंगन एकदम खुला हुआ था। गर्मी के मौसम में ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी। उनका घर गांव में किनारे था और घर से उनकी बेटियां भी जा चुकी थीं इसीलिए पूरा घर जैसे सांय-सांय कर रहा था।

आसमान बहुत साफ था। तारों की टिमटिमाहट ऐसे लग रही थी मानो किसी माली ने चमकदार फूलों से पूरे आसमान को सजा दिया हो।

“मेरी तबीयत नहीं सही हो रही है अगर मुझे कुछ हो गया तो तुम्हारा क्या होगा। मुझे माफ कर देना शायद मैं पूरी जिंदगी तुम्हारा साथ नहीं दे सकता।” रवि के पापा ने आसमान की तरफ देखते हुए अपनी पत्नी से कहा।”

खाट के एक किनारे बैठी उनकी पत्नी सिसक-सिसक के रोने लगीं। शायद ये बातें उनके हृदय को चोट कर जाती थीं।

“मुझे अपने भगवान पर पूरा भरोसा है। मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है जो भगवान मेरे साथ इतना अन्याय करेगा।” रूंधे हुए गले में उनकी पत्नी ने जवाब दिया।

“बड़ी तेज प्यास लगी है” रवि के पापा ने पानी मांगते हुए कहा।
उनकी पत्नी रसोईघर से गिलास लेकर नल की तरफ पानी लेने चली गईं। पानी लेकर लौटीं। अपने पति को आवाज दिया। कोई जवाब ही नहीं आया।

“ये भी कितनी जल्दी सो जाते हैं” मन ही मन उनकी पत्नी बुदबुदाती हुई खाट पर बैठ गईं।

लेकिन यह क्या, रवि के पापा तो चिर निद्रा में चले गए थे। वे तो इस दुनिया से कहीं बहुत दूर जा चुके थे।

रोहा-गाहट मच गया। रवि की मां चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगीं। कुछ देर बाद गांव वालों को भी पता चला कि रवि के पापा अब इस दुनिया में नहीं रहे। रात बीती, सुबह बीता। दोपहर तक रवि भी पहुंच चुका था घर।

अंतिम संस्कार किया उसने पिता का अपने।

कहते हैं न, समय हर घाव भर देता है लेकिन घाव जब बहुत गहरा हो तो वह भरता नहीं, थोड़ा नॉर्मल जरूर हो जाता है।

अब तो रवि की मां की आदत घर में अकेले रहने की पड़ गई थी। क्योंकि रवि फिर से प्रयागराज चला गया था। 1 महीने बाद उसकी परीक्षा थी।
जब से रवि के पापा का देहावसान हुआ था, उसकी मां सदमे में रहने लगी थीं। एकदम उदास। उनका हंसता हुआ चेहरा, न जाने कहां खो गया था।

एक महीने भी बीते रवि ने अपनी सिविल की परीक्षा भी दी। अब वह घर आने वाला था लेकिन प्रारब्ध ने कुछ और ही रचा था। उसकी मां भी अपने पति के पास परलोक में ही चली गईं।

अपनी मां का भी अंतिम संस्कार किया उसने। परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। रवि के लिए बहुत खुशी की बात थी कि उसने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और भारतीय प्रशासनिक सेवा(आईएएस) में उसका चयन भी हो गया था। अब तो वह जो चाहे सो कर सकता था।

आज इन सब घटनाओं के करीब 6 साल बीत चुके हैं। उसने अपने पसंद की शादी भी कर ली है। अपने गद्दीदार लाल सोफे पर बैठा हुआ रवि, अपनी मां की तस्वीर को देख रहा है कि उसकी मां ने साड़ी कितनी पुरानी पहनी है तस्वीर में।

अफसोस वह अपनी मां को एक साड़ी तक खरीद कर नहीं दे सकता क्योंकि मां इस दुनिया में नहीं है।

हासिम ने अपनी छोटी कमाई में ही अपने अब्बू जान को एक स्कूटर खरीद कर दिया है। अफसोस रवि अपने पापा को एक नई साइकिल तक न दे सका।
आज 6 साल बाद वह महसूस कर रहा था कि पैसा और पद के लालच में उसने उन लोगों को खो दिया जो अंतिम सांस तक उसके मददगार रहे।

रवि रो रहा है। तकिए से मुंह छिपाकर सिसक-सिसक कर रो रहा है। आज उसे आभास हो रहा है कि समय वापस नहीं आता। उसके पापा अब नहीं आएंगे, उसकी मां भी।

रोते-रोते उसके मुंह से आखिर निकल ही जाता है- ”काश! मैं एक नालायक बेटा होता तो शायद ये जीवन भर का पछतावा नहीं होता। काश! मैं एक नालायक बेटा होता।


-मृत्युंजय शुक्ल ‘ आदर्श ‘
प्रधान संपादक, न्यूज क्रॉनिकल।

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