भगवान भैरव को शराब चढ़ाना सही है या गलत?

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भैरव पूजा में मदिरा चढ़ाने की सदियों पुरानी परंपरा है, लेकिन कई धार्मिक मत इसे सात्विक पूजा पद्धति के खिलाफ मानते हैं।

Mahakal Bhairav

महाकाल भैरव को शराब चढ़ाते श्रद्धालु।

भगवान भैरव को भगवान शिव का उग्र स्वरूप माना जाता है और उन्हें मदिरा यानी शराब चढ़ाने की परंपरा देश के कई मंदिरों में सदियों से चली आ रही है। उज्जैन का काल भैरव मंदिर इसी परंपरा के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है, जहां रोजाना भक्त पुजारियों के माध्यम से मूर्ति को शराब अर्पित करते हैं। यह परंपरा मुख्य रूप से तांत्रिक पूजा पद्धति से जुड़ी बताई जाती है।

हालांकि इसी परंपरा को लेकर धार्मिक और सामाजिक स्तर पर एक लंबे समय से बहस भी चलती रही है। एक पक्ष इसे भैरव के उग्र और रक्षक स्वरूप की पूजा का प्राचीन व शास्त्र सम्मत हिस्सा मानता है, तो दूसरा पक्ष सात्विक पूजा परंपरा का हवाला देकर इस पर सवाल उठाता है। यह लेख दोनों पक्षों की दलीलों को सरल भाषा में सामने रखता है।

परंपरा का आधार क्या है

हिंदू शास्त्रों में भैरव के आठ रूप बताए गए हैं, जिन्हें अष्ट भैरव कहा जाता है। इनमें काल भैरव, संहार भैरव, क्रोध भैरव और बटुक भैरव जैसे स्वरूप शामिल हैं। शिव पुराण की एक कथा के अनुसार भगवान शिव के क्रोध से भैरव की उत्पत्ति हुई थी और उन्हें काशी का कोतवाल यानी रक्षक नियुक्त किया गया था।

भैरव की पूजा शिव की तंत्र साधना का हिस्सा मानी जाती है। तांत्रिक परंपरा में उग्र देवताओं को मदिरा, मांस जैसी चीजें अर्पित करने की प्रथा रही है। उज्जैन के काल भैरव मंदिर के अनुसार यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है, हालांकि यह ठीक कब और कैसे शुरू हुई, इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।

काल भैरव अष्टमी और काल भैरव जयंती जैसे पर्वों पर भक्त विशेष रूप से भगवान को मदिरा का भोग लगाते हैं। मान्यता है कि इससे भय दूर होता है और मनोकामना पूरी होती है। उज्जैन में अप्रैल 2025 में शराबबंदी लागू होने के बाद भी प्रशासन ने काल भैरव मंदिर के लिए विशेष छूट दी, जिससे श्रद्धालु शराब को प्रसाद के रूप में चढ़ा सकें, भले ही मंदिर के पास के शराब काउंटर बंद कर दिए गए।

शराब चढ़ाने का विरोध करने वाले तर्क क्या देते हैं

जो लोग इस परंपरा पर सवाल उठाते हैं, वे मुख्य रूप से सात्विक पूजा पद्धति की दलील देते हैं। हिंदू धर्म की मुख्यधारा वैदिक पूजा परंपरा में देवी-देवताओं को जल, दूध, फल, फूल और मिठाई जैसी सात्विक चीजें अर्पित करने का विधान है। इस नजरिए से शराब जैसे नशीले पदार्थ को भगवान को अर्पित करना पूजा की मूल भावना के विपरीत माना जाता है।

कुछ धार्मिक विद्वान यह भी बताते हैं कि शराब चढ़ाने की परंपरा मुख्य रूप से तांत्रिक और गुह्य (गूढ़) पूजा पद्धति से जुड़ी है, जो सामान्य गृहस्थ पूजा से अलग है। कई पंडित काल भैरव जयंती के अवसर पर यह सलाह भी देते हैं कि गृहस्थ लोगों को भैरव की तामसिक पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह विधि विशेष साधकों और तांत्रिकों के लिए मानी जाती है, आम भक्तों के लिए नहीं।

इसके अलावा सामाजिक स्तर पर भी यह तर्क दिया जाता है कि मंदिर परिसर में शराब की मौजूदगी से नशे का माहौल बन सकता है और कई बार इसका दुरुपयोग होने की आशंका रहती है। यही वजह है कि उज्जैन में शराबबंदी लागू होने पर मंदिर के पास के शराब काउंटर बंद करने का फैसला लिया गया, भले ही प्रसाद चढ़ाने की अनुमति बरकरार रखी गई।

परंपरा का समर्थन करने वाले क्या कहते हैं

इस परंपरा के समर्थक इसे शास्त्र सम्मत और प्राचीन काल से चली आ रही पूजा पद्धति का हिस्सा बताते हैं। उनका तर्क है कि भैरव शिव के उग्र और संहारक स्वरूप हैं, इसलिए उनकी पूजा सामान्य सौम्य देवताओं से अलग विधि से होती है। तंत्र शास्त्र में उग्र देवताओं को उनकी प्रकृति के अनुरूप चीजें अर्पित करने का विधान बताया गया है।

समर्थकों का यह भी कहना है कि शराब चढ़ाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटा जाता है, जिसे वे आस्था और भक्ति भाव से ग्रहण करते हैं। ऐसी ही परंपरा देश के कुछ अन्य धार्मिक स्थलों पर भी देखी जाती है। अमृतसर के पास मुस्लिम संत बाबा रोडे शाह के मजार पर भी भक्त वर्षों से शराब अर्पित करने की परंपरा निभाते आए हैं, जिसे वहां भी प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

भैरव भक्तों का यह भी मानना है कि यह परंपरा किसी को नशे के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से नहीं है, बल्कि यह भैरव के विशेष स्वरूप और उनकी पूजा पद्धति से जुड़ी धार्मिक आस्था का विषय है। उनके अनुसार पूजा में चढ़ाई गई हर वस्तु भक्त की श्रद्धा का प्रतीक होती है, चाहे वह जल हो या मदिरा।

विवाद का मूल बिंदु

इस पूरे विषय पर असल विवाद दो अलग-अलग पूजा दर्शन के बीच है। एक तरफ वैदिक सात्विक पूजा परंपरा है, जो शुद्धता और सादगी पर जोर देती है। दूसरी तरफ तांत्रिक पूजा परंपरा है, जो उग्र देवताओं की पूजा के लिए अलग नियम मानती है। दोनों ही परंपराएं हिंदू धर्म के भीतर सदियों से साथ-साथ चलती रही हैं।

इसलिए भैरव को शराब चढ़ाना गलत है या सही, यह कोई एक निश्चित उत्तर वाला सवाल नहीं है, बल्कि यह भक्त की आस्था, परंपरा और पूजा पद्धति को लेकर नजरिए पर निर्भर करता है। जहां एक वर्ग इसे गूढ़ पूजा परंपरा का हिस्सा मानकर श्रद्धा से निभाता है, वहीं दूसरा वर्ग सात्विक पूजा के सिद्धांतों के आधार पर इस पर सवाल उठाता रहा है।

प्रशासनिक स्तर पर भी इस विषय को लेकर अलग-अलग फैसले देखने को मिलते हैं। जैसे उज्जैन में शराबबंदी के बावजूद काल भैरव मंदिर में मदिरा चढ़ाने की अनुमति बरकरार रखी गई, जबकि मंदिर के आसपास शराब की खुली बिक्री पर रोक लगा दी गई। यह दिखाता है कि प्रशासन भी धार्मिक परंपरा और सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।

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