पराली जलाने पर सख्त हुए शिवराज सिंह, राज्यों को दिए बड़े निर्देश
शिवराज सिंह चौहान और भूपेंद्र यादव ने पराली प्रबंधन की समीक्षा की। हरियाणा में घटनाएं 53.3% घटीं, मध्य प्रदेश में 55 से 277 हुईं।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के कृषि भवन में पराली प्रबंधन पर उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी समीक्षा बैठक की। दोनों मंत्रियों ने बैठक की सह-अध्यक्षता की। बैठक में राज्यों को निर्देश दिया गया कि धान कटाई और रबी बुवाई के बीच बहुत कम समय बचा है, इसलिए पराली जलाने की रोकथाम के लिए जमीन पर तेजी से काम किया जाए।
बैठक में 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के आंकड़े रखे गए। पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं 53.3% और उत्तर प्रदेश में करीब 32% घटीं। पंजाब में भी कुछ गिरावट दर्ज हुई। लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में घटनाएं बढ़ी हैं। शिवराज सिंह चौहान ने इस पर चिंता जताई और दोनों राज्यों को तुरंत विशेष कार्ययोजना लागू करने को कहा।
कौन-कौन रहा बैठक में
बैठक में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी मौजूद रहे। दिल्ली-एनसीआर के साथ पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री भी शामिल हुए। केंद्रीय कृषि सचिव अतीश चंद्रा, पर्यावरण सचिव नरेंद्र भूषण और केंद्र व राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में थे।
दोनों मंत्रियों ने कहा कि अधिकारियों को फाइलों से निकलकर खेतों तक जाना होगा। जिला स्तर पर कलेक्टरों को त्वरित बैठकें करने, सख्त निगरानी रखने और व्यावहारिक समाधान तय करने के निर्देश दिए गए।
मध्य प्रदेश और राजस्थान पर चिंता
चौहान ने बताया कि मध्य प्रदेश में पराली जलाने के मामले 55 से बढ़कर 277 हो गए हैं। राजस्थान में ये मामले 20 से बढ़कर 60 हुए हैं, यानी 200% की बढ़ोतरी। बैठक की सरकारी विज्ञप्ति में मध्य प्रदेश की बढ़ोतरी 452% बताई गई है। लेकिन 55 से 277 का आंकड़ा गणना में करीब 404% की बढ़ोतरी बैठता है।
चौहान ने प्रभावित जिलों और गांवों की पहचान कर तुरंत विशेष योजना बनाने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि कटाई का बड़ा हिस्सा अभी बाकी है। इसलिए जिन राज्यों में घटनाएं कम हुई हैं, वे भी ढिलाई न बरतें।
किसान को आसान और सस्ता विकल्प देने पर जोर
चौहान ने कहा कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि पराली मत जलाओ। किसान को अगली फसल की बुवाई की जल्दी होती है, इसलिए उसे आसान, सुलभ और सस्ता विकल्प देना होगा। उन्होंने कहा कि पराली जलाने से वायु प्रदूषण होता है और मिट्टी के मित्र कीट और पोषक तत्व भी जल जाते हैं।
उनके मुताबिक पराली खेत में मिलाई जाए तो जैविक खाद बनती है। खेत से बाहर जाए तो बायो-सीएनजी, बायो-इथेनॉल, बिजली और चारे के रूप में किसान की अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन सकती है। उन्होंने कहा कि लक्ष्य ऐसा तंत्र बनाना है, जिसमें किसान को पराली जलाने की जरूरत ही न पड़े। इसके साथ पर्यावरण अनुकूल खेती से किसानों को कार्बन क्रेडिट जैसे मौकों का लाभ भी मिल सके।
मशीनों का आंकड़ा और बंद पड़ी मशीनें
चौहान ने बताया कि केंद्र अब तक राज्यों को 3.54 लाख से ज्यादा फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें दे चुका है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 में 26,109 नई मशीनें और दी गई हैं। लेकिन केंद्रीय सर्वेक्षण में सामने आया कि पंजाब में करीब 40% और हरियाणा में 48% पुरानी मशीनें बंद या काम न करने की हालत में हैं।
उन्होंने निर्देश दिया कि नई मशीनों के साथ पुरानी मशीनों की भी तुरंत मरम्मत कराई जाए। कस्टम हायरिंग सेंटरों को सक्रिय करने और छोटे व सीमांत किसानों को सस्ती दरों पर मशीनें दिलाने पर भी जोर दिया गया।
फंड और पंजाब से उपयोगिता प्रमाण पत्र की मांग
बैठक में बताया गया कि फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत 2018-19 से 2025-26 के बीच केंद्र ने राज्यों को 4,266.47 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इसमें पंजाब को 2,056.50 करोड़, हरियाणा को 1,171.71 करोड़, उत्तर प्रदेश को 868.67 करोड़ और मध्य प्रदेश को 59 करोड़ रुपये मिले।
चालू वर्ष 2026-27 के लिए 592.57 करोड़ रुपये का आवंटन तय हुआ है। इसमें से 430.87 करोड़ रुपये जारी हो चुके हैं। चौहान ने आवंटित राशि के धीमे इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने पंजाब सरकार से कहा कि पहले जारी राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र जल्द केंद्र को भेजे, ताकि अगली किस्त बिना रुकावट जारी हो सके।
चारा, बिजली और बायो-ईंधन से जोड़ने के निर्देश
सूखे वाले इलाकों में पराली को चारे के रूप में सुरक्षित रखकर पशुपालकों तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए। थर्मल पावर प्लांट में पराली पेलेट्स की को-फायरिंग और कंप्रेस्ड बायो गैस व 2जी बायो-इथेनॉल संयंत्रों से किसानों को सीधे जोड़ने को भी कहा गया। राज्यों से स्वीकृत आपूर्ति परियोजनाएं बिना देरी के जमीन पर शुरू करने को कहा गया।
चौहान ने पूसा-44 जैसी ज्यादा समय लेने वाली किस्मों की जगह कम अवधि वाली किस्मों को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। इनमें पूसा 2090 और पीआर126 जैसी किस्में शामिल हैं। इससे कटाई के बाद खेत खाली करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
दोपहर 3 बजे के बाद सैटेलाइट गैप पर नजर
भूपेंद्र यादव ने कहा कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पूरी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि दोपहर 3 बजे के बाद सैटेलाइट पास न होने की वजह से निगरानी में अंतराल रहता है। उस दौरान ग्राउंड पेट्रोलिंग और फ्लाइंग स्क्वॉड के जरिए पराली जलाने पर सख्त नजर रखी जाए।
चौहान ने कहा कि जमीन पर अमल की मुख्य जिम्मेदारी राज्यों की है, लेकिन केंद्र तकनीकी, प्रशासनिक और आर्थिक मदद के साथ राज्यों और किसानों के साथ खड़ा है। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों, सभी संबंधित मंत्रालयों और जिला प्रशासनों से इसे साझा राष्ट्रीय संकल्प मानकर काम करने की अपील की।