महर्षि अरविंद को सिद्धार्थनगर के सवर्ण नेताओं का पिंडदान क्यों करना पड़ा?
महर्षि अरविंद।
महर्षि अरविंद ने समाज में सुधार और अपने समाज के मुद्दों को लेकर एक अनोखा धार्मिक अनुष्ठान किया। अमावस्या के अवसर पर उन्होंने उन सवर्ण नेताओं का प्रतीकात्मक पिंडदान किया, जिन पर समाज के हितों से जुड़े मुद्दों पर चुप रहने का आरोप लगाया गया है। इस अनुष्ठान के जरिए उन्होंने ऐसे जनप्रतिनिधियों से सामाजिक दूरी बनाने का संदेश दिया।
महर्षि अरविंद का कहना है कि भारतीय परंपरा में ऋषि-मुनियों ने समय-समय पर समाज में सुधार और जागरूकता के लिए अलग-अलग तरह के अनुष्ठानों और धार्मिक प्रतीकों का सहारा लिया है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने पिंडदान को विरोध के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया।
इस दौरान सवर्ण समाज के युवाओं और धर्माचार्यों ने भी प्रदर्शन में हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के प्रस्तावित नियमों को वापस लेने और जातिगत आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग उठाई। उनका आरोप है कि प्रस्तावित नियम सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के हितों को प्रभावित कर सकते हैं।

प्रदर्शनकारियों ने जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर सहायता देने की मांग भी की। उनका कहना है कि जरूरतमंद लोगों को आर्थिक स्थिति के आधार पर अवसर और सहायता मिलनी चाहिए।
महर्षि अरविंद ने कहा कि समाज से जुड़े मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी होती है कि वे अपनी आवाज उठाएं। उनके मुताबिक, जब नेता अपने समाज से जुड़े मुद्दों पर लगातार चुप रहते हैं तो यह चुप्पी समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करती है।
उन्होंने इसी नाराजगी को धार्मिक प्रतीक के जरिए सामने रखा और कहा कि पिंडदान किसी व्यक्ति की वास्तविक मृत्यु का नहीं, बल्कि ऐसे नेताओं के प्रति सामाजिक असहमति और संबंध खत्म करने का प्रतीक है।
महर्षि अरविंद ने चेतावनी दी कि अगर UGC के प्रस्तावित नियम वापस नहीं लिए गए और आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा नहीं हुई, तो आगामी पितृपक्ष की सर्वपितृ अमावस्या पर देशभर में ऐसे नेताओं के खिलाफ इसी तरह का सामूहिक प्रतीकात्मक विरोध किया जाएगा।