राजघाट का 70 साल पुराना कंकाल: क्या अब खुलेंगे काशी के 1,000 साल पुराने राज?
वाराणसी के राजघाट से 1957 में मिले और पिछले करीब 70 वर्षों से बीएचयू में सुरक्षित रखे गए लगभग 1,000 साल पुराने मानव कंकाल की अब डीएनए और आइसोटोप जांच होगी। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस अध्ययन से काशी के प्राचीन निवासियों की वंशावली, खानपान, प्रवास और मध्य गंगा घाटी के इतिहास से जुड़े कई अहम रहस्यों से पर्दा उठ सकेगा।
वाराणसी में मिला कंकाल।
वाराणसी के इतिहास को समझने की कोशिश अब एक ऐसे कंकाल के सहारे आगे बढ़ रही है, जो पिछले लगभग 70 वर्षों से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में एक लकड़ी के बक्से में सुरक्षित रखा गया था। यह सिर्फ एक पुराना कंकाल नहीं है, बल्कि संभव है कि यह उस दौर के लोगों की पहचान, खानपान, वंश और जीवनशैली के बारे में ऐसे सवालों के जवाब दे, जिनका इतिहासकार दशकों से इंतजार कर रहे हैं।
यह कंकाल 1957 में राजघाट की खुदाई के दौरान मिला था। राजघाट, गंगा और वरुणा नदियों के संगम के पास स्थित वाराणसी का सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल माना जाता है। 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के दौरान इस स्थल का महत्व सामने आया था। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और बीएचयू ने 1957 से 1969 के बीच यहां कई चरणों में खुदाई की। इन खुदाइयों में अलग-अलग कालखंडों के अवशेष मिले, जिनसे यह साबित हुआ कि वाराणसी दुनिया के सबसे पुराने लगातार बसे शहरों में से एक रही है।
कंकाल मिलने के बाद उसे बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने सावधानी से संरक्षित कर लिया था। उस समय भारत में प्राचीन डीएनए (Ancient DNA) की जांच जैसी आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी। इसलिए वैज्ञानिकों ने उसे सुरक्षित रखना ही बेहतर समझा, ताकि भविष्य में तकनीक विकसित होने पर उससे ज्यादा जानकारी हासिल की जा सके। अब, जब डीएनए विश्लेषण और रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी तकनीकें काफी आगे बढ़ चुकी हैं, तब उस बक्से को खोलने का फैसला लिया गया।
इस पहल की शुरुआत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एम.पी. अहिरवार ने की। उन्होंने बीएचयू के प्राणी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे से संपर्क किया। आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नॉस्टिक्स (सीडीएफडी) के वैज्ञानिकों की टीम, डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह के नेतृत्व में वाराणसी पहुंची। टीम ने पहले बीएचयू के अधिकारियों को यह प्रशिक्षण दिया कि हजार साल पुराने जैविक अवशेषों को बिना किसी आधुनिक डीएनए से दूषित किए कैसे संभाला जाए। इसके बाद वैज्ञानिकों ने विशेष सुरक्षा उपकरण पहनकर लकड़ी का बक्सा खोला।
बक्सा खुलने पर पता चला कि कंकाल कई हिस्सों में बिखरा हुआ था। अच्छी बात यह रही कि हड्डियों पर किसी तरह का रासायनिक संरक्षण नहीं किया गया था। यही वजह है कि उनमें प्राचीन डीएनए मिलने की संभावना बनी हुई है। वैज्ञानिकों ने लंबी हड्डियों के कुछ हिस्सों के नमूने लिए हैं, क्योंकि इन्हीं में डीएनए संरक्षित रहने की संभावना सबसे अधिक मानी जाती है। अब इन नमूनों की जांच हैदराबाद, लखनऊ या बेंगलुरु की विशेष प्रयोगशालाओं में की जाएगी।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह कंकाल करीब एक हजार वर्ष पुराना है, लेकिन इसकी वास्तविक आयु रेडियोकार्बन डेटिंग से तय होगी। इस तकनीक में हड्डियों में मौजूद कार्बन-14 की मात्रा मापकर यह पता लगाया जाता है कि व्यक्ति किस काल में जीवित था। यह जांच सिर्फ उम्र ही नहीं बताएगी, बल्कि उस समय के ऐतिहासिक संदर्भ को भी अधिक स्पष्ट करेगी।
यदि हड्डियों से पर्याप्त डीएनए मिल जाता है, तो वैज्ञानिक सबसे पहले माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए की जांच करेंगे। यह डीएनए मां से संतानों तक लगभग बिना बदले पहुंचता है, इसलिए इससे हजारों साल पुरानी मातृ वंशावली का पता लगाया जा सकता है। चूंकि शुरुआती अध्ययन में कंकाल पुरुष का प्रतीत हो रहा है, इसलिए वैज्ञानिक वाई-क्रोमोसोम की भी जांच करेंगे। इससे पिता की वंश परंपरा और उस व्यक्ति की आनुवंशिक उत्पत्ति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
इस शोध का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण होगा। किसी व्यक्ति की हड्डियों और दांतों में मौजूद कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और स्ट्रॉन्शियम जैसे तत्व उसके खानपान और भौगोलिक परिवेश के संकेत देते हैं। इससे पता लगाया जा सकता है कि वह व्यक्ति मुख्य रूप से शाकाहारी था या मांसाहारी, अनाज अधिक खाता था या नदी से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर था। कुछ मामलों में यह भी समझा जा सकता है कि वह अपने जीवन भर एक ही इलाके में रहा या किसी दूसरे क्षेत्र से यहां आया था।
इस अध्ययन की एक और खास बात यह है कि इसके नतीजों की तुलना हरियाणा के राखीगढ़ी से मिले हड़प्पा सभ्यता के मानव अवशेषों सहित दक्षिण एशिया की अन्य प्राचीन आबादियों से की जाएगी। यदि आनुवंशिक समानताएं मिलती हैं, तो इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि गंगा घाटी की आबादी का विकास कैसे हुआ और अलग-अलग सभ्यताओं के लोगों के बीच किस तरह का संपर्क या प्रवास हुआ।
इतिहासकारों के लिए यह शोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वाराणसी का इतिहास धार्मिक ग्रंथों और साहित्य में तो खूब मिलता है, लेकिन यहां रहने वाले आम लोगों के जैविक और आनुवंशिक इतिहास पर बहुत कम वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं। यह कंकाल पहली बार ऐसे सवालों के जवाब दे सकता है कि करीब एक हजार साल पहले काशी में रहने वाले लोग कौन थे, वे क्या खाते थे, उनका आनुवंशिक संबंध किन आबादियों से था और उनका जीवन कैसा था।
करीब सात दशक तक सुरक्षित रखा गया यह कंकाल अब सिर्फ एक पुरातात्विक अवशेष नहीं रह गया है। आधुनिक विज्ञान की मदद से यह वाराणसी के उस अतीत की कहानी सामने ला सकता है, जिसे अब तक केवल इतिहास की किताबों और पुरातात्विक खुदाइयों के आधार पर समझा जाता रहा है। यदि डीएनए और आइसोटोप जांच सफल रहती है, तो यह अध्ययन न केवल काशी, बल्कि पूरे मध्य गंगा क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को नए नजरिए से देखने का अवसर देगा।