‘गालियों’ की सही ठहराएगी द्रविड़ राजनीति?
क्या द्रविड़ राजनीति की दिशा एक बार फिर से विजय सी जोसेफ ने तय कर दी है या कुछ और होने वाला है?
उदयनिधि स्टालिन बनाम एमके स्टालिन।
तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ शब्दों की मर्यादा और सत्ता के दुरुपयोग, दोनों एक साथ शर्मसार करते हैं। नेता प्रतिपक्ष उदयनिधि स्टालिन को थानजावुर में एक टिप्पणी को लेकर हिरासत में लिया जाना, फिर मद्रास हाईकोर्ट का उन्हें उसी दिन रिहा करने का आदेश देना, यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी की कहानी नहीं है। यह इस बात की कहानी है कि आज की राजनीति किस हद तक गिर चुकी है, और सत्ता में बैठे लोग किस आसानी से पुलिस मशीनरी को अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हथियार बना लेते हैं।
पहले बात करें भाषा की
अगर उदयनिधि स्टालिन ने वाकई किसी अभिनेत्री को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की है, जैसा टीवीके का आरोप है, तो इसकी कोई माफी नहीं होनी चाहिए। एक जन प्रतिनिधि, वह भी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति, अगर सार्वजनिक मंच से महिलाओं पर फब्तियाँ कसता है, तो यह सिर्फ अशोभनीय नहीं, बल्कि उस पद की गरिमा का सीधा अपमान है। ‘कट, कॉपी, पेस्ट’ कहकर पूरे मामले को टाल देना और खुद को पीड़ित बताना, राजनेताओं की उस पुरानी आदत का हिस्सा है जिसमें गलती मानने से ज्यादा आसान सफाई देना लगता है।
लेकिन सरकार का रवैया उतना ही खतरनाक है
दूसरी तरफ, जिस तरह पुलिस सुबह-सुबह घर से उठाकर, रास्ते बदल-बदलकर, भारी सुरक्षा में एक विधानसभा सत्र शुरू होने से ठीक एक दिन पहले नेता प्रतिपक्ष को हिरासत में लेती है, वह भी बिना किसी तात्कालिक खतरे के यह सवाल उठाना लाजमी है कि क्या यह वाकई कानून-व्यवस्था का मामला था, या सत्ता का प्रदर्शन। खुद सरकार ने हाईकोर्ट में कबूल किया कि उसे स्टालिन को रिमांड पर लेने का कोई इरादा नहीं था। तो फिर सवाल उठता है अगर गिरफ्तारी नहीं, सिर्फ पूछताछ करनी थी, तो इतना तमाशा किसके लिए रचा गया? जवाब शायद उतना पेचीदा नहीं जितना बनाया जा रहा है।
दोनों तरफ सिर्फ राजनीति
डीएमके नेताओं का यह कहना कि यह “बदले की कार्रवाई” है, और भाजपा तथा टीवीके समर्थकों का इसे “देर से मिला न्याय” बताना, दोनों ही प्रतिक्रियाएँ अपने-अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से गढ़ी गई लगती हैं। सड़कों पर पटाखे फोड़ना, पुतले जलाना, चप्पलें फेंकना, सड़कें जाम करना, यह सब उस राजनीतिक संस्कृति की झलक है जहाँ असली मुद्दे, जैसे कावेरी जल विवाद या आगामी बजट, पीछे छूट जाते हैं और व्यक्तिगत अहं की लड़ाई आगे आ जाती है। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की यह बात ध्यान देने लायक है कि टिप्पणी भी अनुचित थी और हिरासत भी, दोनों ही असल मुद्दों से ध्यान भटकाने वाली घटनाएँ साबित हुईं।
अदालत ने संतुलन बचाया
इस पूरे प्रकरण में अगर किसी संस्था ने अपनी गरिमा बचाई है, तो वह है मद्रास हाईकोर्ट। बिना किसी पक्ष का साथ दिए, कोर्ट ने साफ कहा कि पूछताछ पूरी होते ही रिहाई हो न ज्यादा सख्ती, न राजनीतिक नाटक को हवा। यही वह संतुलन है जो कार्यपालिका अक्सर भूल जाती है और न्यायपालिका को याद दिलाना पड़ता है।
आखिर में सवाल जनता से
क्या किसी नेता की अभद्र भाषा को बर्दाश्त किया जाना चाहिए क्योंकि वह जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि है? नहीं। और क्या सत्ता में बैठी सरकार को अपने विरोधियों को दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करने की छूट मिलनी चाहिए? बिल्कुल नहीं। तमिलनाडु की जनता को यह समझना होगा कि जब नेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में व्यस्त हैं, तो असली नुकसान उन मुद्दों का हो रहा है जिनके लिए उन्हें वोट मिला था। राजनीति अगर इसी तरह निजी हमलों और बदले की कार्रवाइयों का अखाड़ा बनती रहेगी, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार यही होगी कि जनता तमाशा देखती रह जाएगी, और उसके सवाल अनुत्तरित रह जाएंगे।