नागार्जुन: हिंदी के महाकवि, जिसका जीवन महाकाव्य है
आलोचकों के अनुसार नागार्जुन के काव्य में भारतीय काव्य परंपरा जीवंत रूप में दिखाई देती है। निराला के बाद उन्हें उन कवियों में गिना गया, जिन्होंने अनेक छंदों, शैलियों और काव्य रूपों का इस्तेमाल किया।
महाकवि नागार्जुन के बारे में द क्रॉनिकल न्यूज के संपादक मृत्युंजय शुक्ल का आलेख
दुख से शुरू हुई एक कहानी
सन 1911 की ज्येष्ठ पूर्णिमा को मधुबनी जिले के सतलखा में ननिहाल के घर एक बच्चे ने जन्म लिया। पिता गोकुल मिश्र और माता उमा देवी के लिए यह खुशी से ज्यादा डर का मौका था। उनकी चार संतानें एक के बाद एक चल बसी थीं।
पांचवीं संतान को लेकर भी आशंका थी कि कहीं यह भी उन्हें छोड़कर न चला जाए। इसलिए बच्चे का नाम रखा गया ‘ठक्कन’। बाद में बाबा वैद्यनाथ की कृपा मानकर उसका नाम वैद्यनाथ मिश्र रखा गया। आगे चलकर दुनिया उन्हें बाबा नागार्जुन के नाम से जानने वाली थी।
कंधे पर बैठकर बीता बचपन
घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पिता काम-धंधा नहीं करते थे और जमीन बेचकर अपनी गलत आदतों में पैसे गंवा चुके थे। अंत में बेटे के लिए सिर्फ तीन कट्ठा उपजाऊ जमीन और लगभग उतनी ही घर की जमीन बची, वह भी कर्ज में डूबी हुई।
छह साल की उम्र में मां का निधन हो गया। पिता अपने इकलौते मातृहीन बेटे को कंधे पर बैठाकर रिश्तेदारों के यहां गांव-गांव घूमने लगे। बचपन की यही मजबूरी आगे चलकर नागार्जुन के जीवन में घुमक्कड़ी का स्वभाव बन गई।
बनारस से लंका तक का सफर
नागार्जुन की पढ़ाई लघु सिद्धांत कौमुदी और अमरकोश से शुरू हुई। मिथिलांचल में धनी लोग गरीब और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को अपने यहां आश्रय देते थे। इसी तरह पढ़ते हुए वे संस्कृत की विधिवत शिक्षा के लिए बनारस पहुंचे।
बनारस में उन पर आर्य समाज का प्रभाव पड़ा और फिर उनका झुकाव बौद्ध दर्शन की ओर हुआ। सुभाष चंद्र बोस उनके प्रिय राजनीतिक नेता थे। उन्होंने राहुल सांकृत्यायन को अपना अग्रज माना और दोनों गुरु-भाई कहलाए।
बनारस से कोलकाता और फिर दक्षिण भारत होते हुए वे श्रीलंका के प्रसिद्ध विद्यालंकार परिवेण पहुंचे। वहां उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और 1936 में नागार्जुन नाम अपनाया। श्रीलंका में रहते हुए उनकी रुचि बौद्ध दर्शन के साथ विश्व राजनीति में भी बढ़ी।
कलम और आंदोलन, दोनों के सिपाही
1938 के मध्य में भारत लौटने के बाद नागार्जुन का घुमक्कड़ जीवन जारी रहा। वे सिर्फ कविता लिखने वाले साहित्यकार नहीं थे, बल्कि जनता के आंदोलनों में सीधे भाग लेने वाले जनकवि भी थे।
स्वामी सहजानंद से प्रभावित होकर वे बिहार के किसान आंदोलन में शामिल हुए। उन्होंने पुलिस की मार झेली और जेल की सजा भी भुगती। चंपारण के किसान आंदोलन में भी उनकी भागीदारी रही।
अप्रैल 1974 में जेपी आंदोलन के दौरान उन्होंने सत्ता की दुर्नीतियों के खिलाफ संघर्ष में अपनी सक्रिय भागीदारी की बात कही। उनका मानना था कि आंदोलन में उनकी भूमिका केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि कर्म के स्तर पर भी होनी चाहिए। आपातकाल से पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा।
68 साल तक चलती रही कलम
नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना मैथिली कविता थी, जो 1929 में दरभंगा की पत्रिका ‘मिथिला’ में छपी। उनकी पहली हिंदी रचना ‘राम के प्रति’ 1934 में लाहौर के साप्ताहिक ‘विश्वबंधु’ में प्रकाशित हुई।
1929 से 1997 तक लगभग 68 वर्षों तक उनकी कलम लगातार चलती रही। कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, निबंध और बाल साहित्य—हर विधा में उन्होंने लेखन किया।
हिंदी के अलावा उन्होंने मैथिली, संस्कृत और बांग्ला में भी मौलिक रचनाएं कीं। मैथिली में वे ‘यात्री’ नाम से लिखते थे। 1941 के बाद उन्होंने हिंदी में केवल ‘नागार्जुन’ नाम से लिखने का निर्णय लिया।
उनकी चर्चित रचनाएं
नागार्जुन की प्रमुख कृतियों में कई कविता संग्रह और उपन्यास शामिल हैं।
प्रमुख कविता संग्रह:
- ‘युगधारा’
- ‘सतरंगे पंखों वाली’
- ‘प्यासी पथराई आंखें’
- ‘हजार-हजार बाहों वाली’
- ‘पुरानी जूतियों का कोरस’
प्रमुख उपन्यास:
- ‘रतिनाथ की चाची’
- ‘बलचनमा’
- ‘नयी पौध’
- ‘बाबा बटेसरनाथ’
- ‘वरुण के बेटे’
मैथिली में उनकी चर्चित रचना ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ और बांग्ला में ‘मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा’ भी उल्लेखनीय हैं।
अनुवादक के रूप में नागार्जुन
कालिदास उनके प्रिय कवि थे और ‘मेघदूत’ उनकी प्रिय पुस्तकों में शामिल थी। उन्होंने 1953 में ‘मेघदूत’ का मुक्तछंद में अनुवाद किया। जयदेव के ‘गीत गोविंद’ का भावानुवाद वे 1948 में कर चुके थे।
उन्होंने शरतचंद्र के कई उपन्यासों का हिंदी अनुवाद किया। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के गुजराती उपन्यास ‘पृथ्वीवल्लभ’ का हिंदी अनुवाद 1945 में किया। 1965 में विद्यापति के सौ गीतों का भावानुवाद भी किया।
फरवरी 1978 में उन्होंने बांग्ला में मौलिक लेखन शुरू किया और सितंबर 1979 तक लगभग 50 कविताएं लिखीं।
सम्मान खूब मिले, लेकिन आर्थिक संघर्ष बना रहा
1969 में ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें मैथिली में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्हें भारत भारती सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और 1994 में बिहार सरकार का राजेंद्र शिखर सम्मान मिला। साहित्य अकादमी ने उन्हें अपनी सर्वोच्च फेलोशिप से भी सम्मानित किया। पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें राहुल सांकृत्यायन सम्मान दिया।
लेकिन इन सम्मानों के बावजूद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ। 1948 में उन्हें पहली बार दमे का दौरा पड़ा और पर्याप्त इलाज न मिलने के कारण वे जीवन भर इस बीमारी से जूझते रहे।
दो बेटियों और चार बेटों के पिता नागार्जुन पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी पूरी तरह नहीं निभा सके। परिवार के पास विरासत में मिली वही थोड़ी-सी जमीन बची रही।
जनभाषा, विद्रोह और भारतीय काव्य परंपरा
आलोचकों के अनुसार नागार्जुन के काव्य में भारतीय काव्य परंपरा जीवंत रूप में दिखाई देती है। निराला के बाद उन्हें उन कवियों में गिना गया, जिन्होंने अनेक छंदों, शैलियों और काव्य रूपों का इस्तेमाल किया।
उनकी भाषा में ठेठ देसी शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ पदावली तक मिलती है। उनकी रचनाओं में आम जनता का जीवन, सामाजिक विषमता, राजनीतिक संघर्ष और व्यवस्था के प्रति विद्रोह प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
साहित्यकार उदय प्रकाश ने बाबा नागार्जुन को हिंदी का अद्वितीय और मौलिक बौद्धिक कवि माना।
एक घुमक्कड़ का अंतिम पड़ाव
5 नवंबर 1998 को बाबा नागार्जुन का निधन हुआ। उनका जीवन गरीबी, संघर्ष, यात्राओं, आंदोलनों और साहित्यिक साधना से भरा रहा।
जिस बच्चे को उसका पिता कंधे पर बैठाकर गांव-गांव घुमाता था, उसी बच्चे ने आगे चलकर अपनी पूरी जिंदगी पैदल चलते हुए हिंदी कविता को जनता तक पहुंचाया। यही संघर्ष और जनपक्षधरता उन्हें हिंदी का जनकवि बनाती है।